रूस को बीसवीं शताब्दी के आरंभ में एशिया का बहुत शक्ति संपन्न देश समझा जाता था। रूस भी इंग्लैण्ड और फ्रांस की तरह साम्राज्यवाद नीति का अनुगमन करने मे लगा था। दूसरी ओर जापान भी अपनी शक्ति वृद्धि कर चीन में साम्राज्य वृद्धि के लिये प्रयत्नशील था। चीन ने रूस-जापान के साम्राज्यवादी और सैन्यवादी कार्यो और उद्देश्यों में तनाव होना स्वाभाविक था। अतः दोनों में 1904 - 05 में युद्ध हो गया।
जापान रूस में अनबन का प्रमुख कारण मंचूरिया पर दोनो के प्रभाव को लेकर था। मंचूरिया चीनी साम्राज्य का एकमात्र प्रांत था। इसलिए जापान और रूस में तकरार होना स्वाभाविक थीं। जापान अपनी मानसिकता को बदलते हुए वह साम्राज्यवादी होता जा रहा था। शिमोनास्की की संधि का विरोध कर रूस ने चीन से अपना विरोध बताया। 1895 ई. में चीन से संधि कर ली। मंचूली से ब्लादीवोस्तक तक रेल्वे लाइन बिछाने की अनुमति प्राप्त कर रूस से सूदूर पूर्व में अपने प्रसार हेतु अग्रिम कार्यवाही प्रारंभ कर दी। पोर्ट आर्थर एंव उसके समीप का प्रदेश रूस से 25 वर्ष तक पट्टे पर प्राप्त कर लिया और यहां की किलेबंदी शुरू की। रूस मंचूरिया में प्रभाव बढ़ाने लगा। रूस का विचार यहां विस्तार करना था। मंचूरिया के रंगमंच पर रूसी चालें चली गई। रूस की इन चालों से जापान नाराज हो गया। जापान अपनी जनसंख्या को मंचूरिया में बसाना चाहता था। इसके कारण वह ऐसा नहीं कर पा रहा था। रूस ने पोर्ट आर्थर और मास्कों के बीच रेल्वे लाइन बनाई। पूर्वी एशिया के लिए एक रूसी वायसराय नियुक्त किया। जापान के लिए यह असहनीय था।
जापान का चीन से युद्ध के बाद एक संधि हुई, जिसमें जापान को लिआओतुंग का प्रायद्वीप मिला था, परंतु रूस और फ्रांस और जर्मनी के विरोध के कारण उसे उस द्वीप पर उसे अपना अधिकार छोड़ना पड़ा था। अपनी इस क्षति का कारण वह रूस को मानता था और उससे बदला लेना चाहता था। इस युद्ध के कारणों में यह भी एक कारण था।
जापान के द्वारा चीन की पराजय के बाद कोरिया रूस का प्रभाव बढ़ता जा रहा था। चीन में जापान को रोकने के लियें 1895 ई. के समान रूस, जर्मनी और फ्रांस कोई संयुक्त हस्तक्षेप न कर पाये इसलिए जापान ने अपने मित्रों की खोज आरम्भ की। इसी कारण आंग्ल-जापान संधि 1902 ई. में सम्पन्न हुई जिसमें इंग्लैण्ड़ ने जापान के कोरिया में विशेष हित और जापान चीन में इंग्लैण्ड़ के हितों को स्वीकार कर अन्य देश के आक्रमण के समय स्वंय तटस्थ रहने तथा अन्य देशों को तटस्थ रखने का प्रयास करने के आश्वासन दिया। इस संधि के बाद जापान का कोरिया में प्रवेश और रूस-जापान युद्ध का रास्ता साफ हो गया। इंग्लैण्ड़ भी इस समय रूस के प्रभाव को काम करना चाहता था और रूस-जापान युद्ध से अच्छा कोई उपाय नहीं था। उधर इंग्लैण्ड़ को जर्मनी की नौसेनिक शक्ति से भी भय था इसलियें उसने जापान से संधि करना उचित माना। दूसरी ओर जर्मनी, आस्ट्रिया और इटली ने भी जापान से सहानुभूति प्रगट की जबकि आंग्ल-जापान संधि के समय रूस अकेला था।
सन् 1900 ई. में चीन में एक विद्रोह हुआ। जिसे बाक्सर विद्रोह के नाम से जाना जाता हैं। इस विद्रोह का प्रभाव रूस के अधिकार क्षेत्र में मौजूद मंचूरिया तक इसका विस्तार हुआ तो रूस ने अपने आर्थिक हितों की सुरक्षा के बहाने वहां सेना उतार दी और यह कहा कि जैसे ही विद्रोह समाप्त होगा वह अपनी सेना को वापस बुला लेगा, परंतु उसने ऐसा नहीं किया। इससे उसके इरादे स्पष्ट हो गए थें। अंततः जापान और रूस का संघर्ष अनिवार्य हो गया था।
इस युद्ध के बाद रूस का अभिमान चूर-चूर हो गया। फलस्वरूप जापान का कोरिया में हस्तक्षेप बढ़ने लगा और वह 1910 ई. तक जापान का अंग बन गया। कोरिया में जापानी भाषा, धर्म, व्यापार, पूलिस तथा सेना का प्रवेश हुआ तथा जापान के हित में कोरिया का आर्थिक विकास किया गया। रेल्वे, यातायात में उन्नति हुई।
कोरिया को जापान के प्रभाव क्षेत्र के रूप में मान्यता दी गई थी
जापान ने दक्षिण सखालिन पर कब्जा कर लिया
जापान को रूसी तट पर मछली का अधिकार प्राप्त हुआ
रूस ने लियाओडोंग प्रायद्वीप और पोर्ट आर्थर को जापान को पट्टे पर दिया था।
इस युद्ध के बाद रूस की आंतरिक राजनीति पूरी तरह डामाडोल हो गई, और रूसी जनता जार के एकतंत्र शासन का विरोध करने लगी। इस युद्ध के कारण ही रूस में सन् 1917 ई. की क्रांति हो गई थी।
रूस पर जापान की जीत से एशिया के राष्ट्रों में नवचेतना एंव उत्साह का संचार हो गया। भारत में राष्ट्रीय आंदोलन तीव्र गति से प्रारंभ हो गया। यह युद्ध एक युगांतकारी घटना बन गया।
इस युद्ध के उपरांत रूस का पूर्वी एशिया का प्रभाव रूक गया तथा यूरोपीय शक्तियों ने चीन में लूट-खसोट की नीति पर अमेरिका के मुक्त व्यापार का समर्थन किया। रूस बाल्कन समस्या में उलझ गया। यूरोप में गुटबंदी प्रांरभ हो गई और यूरोप दो गुटों में विभाजित हो गया। जापान विश्व में एक प्रमुख शक्ति बन गया।
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